(N/A) असममित कार्बन युक्त एल्किल हैलाइड प्रकाशिक सक्रियता प्रदर्शित करते हैं। जब प्रकाशिक सक्रिय हैलाइड नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया देते हैं,तो उत्पाद की प्रकाशिक सक्रियता अभिक्रिया की क्रियाविधि पर निर्भर करती है।
$(a)$ $S_{N}2$ क्रियाविधि में प्रतिपन्न: $S_{N}2$ अभिक्रिया में हैलाइड के विन्यास का प्रतिपन्न (inversion) होता है क्योंकि नाभिकरागी हैलोजन परमाणु की विपरीत दिशा से आक्रमण करता है। इससे विपरीत प्रकाशिक सक्रियता वाला उत्पाद प्राप्त होता है।
उदाहरण: जब $(-)-2-$ब्रोमोऑक्टेन सोडियम हाइड्रॉक्साइड $(NaOH)$ के साथ $S_{N}2$ प्रकार से अभिक्रिया करता है,तो $-OH$ समूह ब्रोमाइड के विपरीत स्थान पर जुड़ता है और $(+)-$ऑक्टेन$-2-$ऑल प्राप्त होता है।
$(b)$ $S_{N}1$ क्रियाविधि में रेसिमीकरण: प्रकाशिक सक्रिय एल्किल हैलाइड की $S_{N}1$ अभिक्रिया में रेसिमीकरण होता है।
$S_{N}1$ अभिक्रिया के प्रथम धीमे चरण में कार्बोकैटायन बनता है। कार्बोकैटायन में धनावेशित कार्बन $sp^{2}$ संकरित होने के कारण समतलीय होता है।
इस समतलीय $sp^{2}$ कार्बन पर नाभिकरागी दोनों दिशाओं (समतल के ऊपर या नीचे) से आक्रमण कर सकता है,जिसके परिणामस्वरूप दो अलग-अलग त्रिविम समावयवियों का मिश्रण प्राप्त होता है। एक उत्पाद में विन्यास का 'धारण' (retention) होता है और दूसरे में 'प्रतिपन्न' (inversion) होता है।
चूंकि इन दोनों उत्पादों का घूर्णन समान लेकिन विपरीत होता है और उनका अनुपात $1:1$ होता है,इसलिए एक रेसिमिक मिश्रण $(\pm)$ प्राप्त होता है। (उदाहरण: $2-$ब्रोमोब्यूटेन का जल-अपघटन)।
$(i)$ $C-Br$ बंध टूटने का धीमा चरण: अभिक्रिया एक समतलीय $sp^{2}$ कार्बोकैटायन मध्यवर्ती के माध्यम से आगे बढ़ती है।