(N/A) कोई भी रासायनिक अभिक्रिया विभिन्न अभिक्रियाओं की प्रतिस्पर्धा का परिणाम होती है। जब ऐल्किल हैलाइड किसी क्षार या नाभिकरागी (nucleophile) के साथ अभिक्रिया करता है,तो उसमें अभिक्रिया होने के दो प्रतिस्पर्धी मार्ग संभव होते हैं:
$(A)$ विलोपन अभिक्रिया
$(B)$ प्रतिस्थापन $(S_N1$ और $S_N2)$ अभिक्रिया
यह अभिक्रिया किस मार्ग से होगी,यह तीन कारकों पर निर्भर करता है: $(i)$ ऐल्किल हैलाइड की प्रकृति,$(ii)$ क्षार/नाभिकरागी की प्रबलता या आकार,$(iii)$ अभिक्रिया की परिस्थितियाँ।
$\Rightarrow$ प्राथमिक हैलाइड $S_N2$ अभिक्रिया को प्राथमिकता देते हैं।
$\Rightarrow$ द्वितीयक हैलाइड क्षार/नाभिकरागी की प्रबलता के आधार पर $S_N2$ या विलोपन अभिक्रिया को प्राथमिकता देते हैं और त्रिविम बाधा (steric hindrance) के कारण कार्बन परमाणु पर आक्रमण करने के बजाय $H$-परमाणु को हटाते हैं।
$\Rightarrow$ तृतीयक हैलाइड कार्बोकेटायन के स्थायित्व या अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन के निर्माण के आधार पर क्रमशः $S_N1$ या विलोपन अभिक्रिया देते हैं। उदाहरण के लिए,$CH_3CHBrCH_3$ के साथ।